Recent Comments

Sunday, 13 November 2016

सांख्ययोग Part [19]

( स्थिरबुद्धि पुरुष के लक्षण और उसकी महिमा )

अर्जुन उवाच
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्‌ ॥

    भावार्थ : अर्जुन बोले- हे केशव! समाधि में स्थित परमात्मा को प्राप्त हुए स्थिरबुद्धि पुरुष का क्या लक्षण है? वह स्थिरबुद्धि पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?॥54॥

श्रीभगवानुवाच
प्रजहाति यदा कामान्‌ सर्वान्पार्थ मनोगतान्‌ ।
आत्मयेवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥

    भावार्थ : श्री भगवान्‌ बोले- हे अर्जुन! जिस काल में यह पुरुष मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को भलीभाँति त्याग देता है और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, उस काल में वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है॥55॥
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥

    भावार्थ : दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में सर्वथा निःस्पृह है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गए हैं, ऐसा मुनि स्थिरबुद्धि कहा जाता है॥56॥

Share:

0 comments:

Post a Comment

Blogroll

Powered by Blogger.

Menu - Pages

Random Posts

Recent Posts

Sponsor Advertisement

Kategori

Kategori

Recent Comments

Contact Us

Name

Email *

Message *

Fashion

Technology

Fashion

Technology

Fashion

Fashion

Translate

Awesome

Flickr Images

Advertisement

Popular Posts

Popular Posts

Blog Archive

Recent Posts

Unordered List

Sample Text

Pages

Theme Support

Blogger templates